(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.216. अध्यायः 216
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
द्रौपदींप्रति कुन्त्या आशीर्वादः॥ 1 ॥ श्रीकृष्णप्रेषितालंकारादीनां पाण्डवैः स्वीकारः॥ 2 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 1-216-0x(1206)(9426)
पाण्डवैः सह संयोगं गतस्य द्रुपदस्य ह।
न बभूव भयं किंचिद्देवेभ्योऽपि कथंचन॥ 1-216-1(9427)
कुन्तीमासाद्य ता नार्यो द्रुपदस्य महात्मनः।
नाम संकीर्तयन्त्योऽस्या जग्मुः पादौ स्वमूर्धभिः॥ 1-216-2(9428)
कृष्णा च क्षौमसंवीता कृतकौतुकमङ्गला।
कृताभिवादना श्वश्र्वास्तस्थौ प्रह्वा कृताञ्जलिः॥ 1-216-3(9429)
रूपलक्षणसंपन्नां शीलाचारसमन्विताम्।
द्रौपदीमवदत्प्रेम्णा पृथाशीर्वचनं स्नुषाम्॥ 1-216-4(9430)
यथेन्द्राणी हरिहये स्वाहा चैव विभावसौ।
रोहिणी च यथा सोमे दमयन्ती यथा नले॥ 1-216-5(9431)
यथा वैश्रवणे भद्रा वसिष्ठे चाप्यरुन्धती।
यथा नारायणे लक्ष्मीस्तथा त्वं भव भर्तृषु॥ 1-216-6(9432)
जीवसूर्वीरसूर्भद्रे बहुसौख्यसमन्विता।
सुभगा भोगसंपन्ना यज्ञपत्नी पतिव्रता॥ 1-216-7(9433)
अतिथीनागतान्साधून्वृद्दान्बालांस्तथा गुरून्।
पूजयन्त्या यथान्यायं शश्वद्गच्छन्तु ते समाः॥ 1-216-8(9434)
कुरुजाङ्गलमुख्येषु राष्ट्रेषु नगरेषु च।
अनु त्वमभिषिच्यस्व नृपतिं धर्मवत्सला॥ 1-216-9(9435)
पतिभिर्निर्जितामुर्वीं विक्रमेण महाबलैः।
कुरु ब्राह्मणसात्सर्वामश्वमेधे महाक्रतौ॥ 1-216-10(9436)
पृथिव्यां यानि रत्नानि गुणवन्ति गुणान्विते।
तान्याप्नुहि त्वं कल्याणि सुखिनी शरदां शतं॥ 1-216-11(9437)
यथा च त्वाऽभिनन्दामि वध्वद्य क्षौमसंवृताम्।
तथा भूयोऽभिनन्दिष्ये जातपुत्रां गुणान्वितां॥ 1-216-12(9438)
वैशम्पायन उवाच। 1-216-13x(1207)
ततस्तु कृतदारेभ्यः पाण्डुभ्यः प्राहिणोद्धरिः।
वैदूर्यमणिचित्राणि हैमान्याभरणानि च॥ 1-216-13(9439)
वासांसि च महार्हाणि नानादेश्यानि माधवः।
कम्बलाजिनरत्नानि स्पर्शवन्ति शुभानि च॥ 1-216-14(9440)
शयनासनयानानि विविधानि महान्ति च।
वैदूर्यवज्रचित्राणि शतशो भाजनानि च॥ 1-216-15(9441)
रूपयौवनदाक्षिण्यैरुपेताश्च स्वलङ्कृताः।
प्रेष्याः संप्रददौ कृष्णो नानादेश्याः स्वलङ्कृताः॥ 1-216-16(9442)
गजान्विनीतान्भद्रांश्च सदश्वांश्च स्वलङ्कृतान्।
रथांश्च दान्तान्सौवर्णैः शुभ्रैः पट्टैरलङ्कृतान्॥ 1-216-17(9443)
कोटिशश्च सुवर्णं च तेषामकृतकं तथा।
वीथीकृतममेयात्मा प्राहिणोन्मधुसूदनः॥ 1-216-18(9444)
तत्सर्वं प्रतिजग्राह धर्मराजो युधिष्ठिरः।
मुदा परमया युक्तो गोविन्दप्रियकाम्यया॥ ॥ 1-216-19(9445)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 216 ॥ ॥ समाप्तं वैवाहिकपर्व ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-216-12 हे वधु अद्य॥ षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 216 ॥


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